क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के समान है-इसमें जलते आप ही हैं.

15 नवंबर 2010

ख्वाहिशें...

कब तलक बहती रहेगी
आँख से ये अश्रुधारा ?
कब तलक गुजरेगी तनहा
जिंदगी यूँ बेसहारा ?
          चाहती हूँ तय सफ़र ,
          करना तुम्हारे साथ में ,
          मैं भी चलना चाहती हूँ ,
          गर बनो मेरा सहारा II
जिंदगी की उलझनों में ,
इस कदर उलझी रही ,
थी कहाँ फुर्सत जो देखूं ,
लौट कर सपने दुबारा II
          डूबने के डर से थी ,
          बैठी रही इस पार मैं ,
          दूर थी मंज़िल मेरी और ,
          तेज थी लहरों की धारा II
नाव थी टूटी, भँवर के
बीच में अटकी पड़ी ,
तुम बनो पतवार तो ,
शायद मिले मुझको किनारा II
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सानपाडा,नवी मुंबई, महाराष्ट्र(मूलतः वाराणसी), India

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