क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के समान है-इसमें जलते आप ही हैं.

28 अक्तूबर 2010

रिअलिटी शो का काला चेहरा

    इन दिनों टीवी पर रिअलिटी शोज की लहर सी चल पड़ी है.हर चैनल पर आपको कोई न कोई रिअलिटी शो नज़र आ जायेगी.कहीं पर अक्की दक्ष शेफ़ की खोज में लगे हैं,तो कहीं पर राखी का इंसाफ हो रहा हैं.कोई करोड़पती बनाने का लालच दे रहा है,तो कोई सुरों का उस्ताद बनाने का.बिग बॉस,छोटे उस्ताद,सा रे ग म,स्वयंवर आदि के भूत और वर्तमान संस्करण देखकर लगता है कि देश कितना तरक्की कर चूका है और भविष्य में यह कितनी प्रगति करेगा.दूरदर्शन जो ऐसे कार्यक्रमों से बहुत दूर था,आखिर कब तक अपने आपको इन सबसे दूर रख पाता.उसे भी तो स्पर्धा के इस दौर में टिके रहना है.टीआरपी की होड़ में न सही,बस खुद को खड़ा रखना है.सो वह भी पिछले दिनों सुर संग्राम,स्मार्ट श्रीमती और न जाने क्या-क्या दिखा चूका है.भईया,कार्यक्रम भी इतने हो चुके हैं न कि किसपे क्या आता है अब वो भी याद नहीं रहता.
     एक हमारे गजेन्द्र सिंह हैं.तारीफ करनी होगी उनकी.बड़ा मजबूत कंधा है उनका.सा रे ग म को कितने सालों से ढोते आ रहे हैं,पर दम नहीं फूल रहा पट्ठे का.क्या हिंदी,क्या मराठी,क्या गुजराती,क्या बंगला...अब महुआ चैनल पर भी भोजपुरी गायक चुनने का बीड़ा उठाये कारनामा किये जा रहे हैं.अब जैसे ये गायक नहीं ढूढेंगे तो बालीवुड में गायकों का अकाल पड़ जायेगा.कोई इनसे जाकर पूछे कि आज तक कितने स्पर्धकों को गायक या गायिका बना पाए?सोनू निगम,कैलाश खेर,सुनिधि चौहान जैसे कुछ गिनती के होंगे.पर ये लोग गजेन्द्र सिंह की वजह से नहीं,बल्कि इसके लिए भारी कीमत चुकाकर आज थोड़ा बहुत नाम कमाए हैं.सुनिधि चौहान ने तो अपनी पूरी पारिवारिक जिंदगी ही चौपट कर डाली,सोनू निगम के साथ क्या हुआ ये सभी जानते हैं.हर साल सा रे ग म जीतकर आने वाले तथाकथित महान गायक या गायिका कहाँ खो जाते हैं कोई सुध लेने वाला नहीं,तलाश शुरू हो जाती है अगले की.खुद गजेन्द्र सिंह को भी पता नहीं होगा की सा रे ग म की पिछली कड़ी का विजेता कौन था.
     अब जरा इनके मेंटर्स की बातों पर गौर करिये.कितनी लच्छेदार बातें करते हैं ये.बेटा-बेटा या बेटी-बेटी कहकर मंच पर तालियाँ बटोरने वाले अंदर से कितने शातिर होते हैं.दरअसल ये एक जाल फेंकते हैं.पहले तो इसके लिए इनकी ऑफिस ही हुआ करती थी,अब खुलेआम टीवी पर करते हैं.रातोंरात स्टार बना देने का झांसा.पूनम यादव तो याद ही होगी आप सभी को.तारे हैं बाराती,चांदनी है ये बारात...कितना बेहतरीन गाया था उसने.परदे पर उसके घर की दशा देखकर आँखों से आँसू निकल पड़े थे.और उसका मेंटर्स ?उसका तो नाम भी लेने पर मुंह का स्वाद बिगड़ जाता है.आप जानते होंगे.कैसे बेटी-बेटी किया करता था?पर जब काम देने की बारी आई तो उसी बेटी में उसे वासना नजर आने लगी.मजबूरी ने समर्पण कर दिया.साल भर शोषित होने के बाद आँख खुली तो नींद की गोलियाँ खाकर आत्महत्या का असफल प्रयास.जी टीवी सीने स्टार्स की दीपिका तिवारी....वह पूनम की तरह खुशकिस्मत नहीं थी.पंखे से लटकी तो निष्प्राण ही उतारा जा सका.
     ऐसी न जाने कितनी घटनाएं हम अक्सर अखबारों में पढते हैं पर हमारी आँख नहीं खुलती.अब तो एक नई बात इन मेंटर्स में देख रहा हूँ.अब इनकी भूखी नजरें मंच पर ही अपना शिकार चुन लेती हैं.कोई दूसरा न ले उड़े,इसलिए प्रतियोगिता के बीच में ही प्रतियोगी को स्टुडियो में आकर गाना रिकॉर्ड करने का ऑफर दे देते हैं...बाद में क्या होता है कौन जानता है ?बातें बहुत सी हैं,पर सबका जिक्र करने से ब्लॉग लंबा हो जायेगा.बस इतना समझ लीजिए कि जो कुछ दिखाया जा रहा है वो सब झूठ है,धोखा है,टीआरपी का खेल है...बड़े अपने बच्चों को इस दलदल में फसने से रोकें...और युवा इस सच्चाई से परिचित हों.
     

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