क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के समान है-इसमें जलते आप ही हैं.

7 नवंबर 2010

सोलह सिंगार...


पाँव की बिछिया तुम्हारे 
बन के रहना चाहता हूँ,
हाँथ के मेहंदी की खुशबू 
बन महकना चाहता हूँ.
                  मैं बनूँ होठों की लाली
                  कान का झुमका भी मैं,
                  उँगलियों पर की अंगूठी
                  मांग का टीका भी मैं.
बन के चूड़ी मैं कलाई की
खनकना चाहता हूँ,
नाक की नथनी सुशोभित हो
दमकना चाहता हूँ.
                  भाल की बिंदिया तुम्हारे
                  पैर की पायल बनूँ,
                  जो चमकती है सदा उस 
                  आँख का काजल बनूँ.
चाहे बाजूबंद हो या,
हो कमर की करधनी,
सुर्ख रंगों की महावर 
बन चमकना चाहता हूँ.
                  मांग का सिन्दूर जगमग,
                  हार बनना चाहता हूँ,
                  मैं तुम्हारा सोलहों 
                  सिंगार बनना चाहता हूँ.  

Share:

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

TRANSLATE

मेरे बारे में..

मेरी फ़ोटो
सानपाडा,नवी मुंबई, महाराष्ट्र(मूलतः वाराणसी), India

Follow by Email

© कॉपीराईट:..

ब्लॉग में उपलब्ध सामग्री के सर्वाधिकार ‘कुसुम प्रकाशन,वाराणसी’के पास सुरक्षित हैं.लेखक या प्रकाशक की लिखित अनुमति के बिना सामग्री का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष उपयोग उक्त कॉपीराईट का उल्लंघन होगा.ऐसी स्थिति में सामग्री का दुरूपयोग करने वाले लोग कॉपीराईट उल्लंघन के दोषी माने जायेंगे.अन्य सामग्री संदर्भ सहित प्रकाशित की गई है जो कॉपीराइट के नियम से मुक्त हैं.

पाठकों की संख्या...