क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के समान है-इसमें जलते आप ही हैं.

11 नवंबर 2010

गांव की गोरी

मुझको मतवाला कर देने
एक दिवानी आई है ,
गांव की गोरी घूंघट ओढ़े
चुनर धानी आई है.....
          अनजानों की बस्ती में मैं
          अनजाना सा रहता था ,
          भीड़ में भोली सी सूरत
          जानी-पहचानी आई है.....
भरी दुपहरी कड़ी धुप से
जलते तपते जीवन को ,
शीतल झोंकों से सहलाने
भोर सुहानी आई है.....
          सतरंगी सपनों को लेकर
          सेज सजाई जो मैंने ,
          खुशबू से उसको महकाने
          रात की रानी आई है.....

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2 टिप्‍पणियां:

  1. किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

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  2. बहुत ही सुंदर .... एक एक पंक्तियों ने मन को छू लिया ...

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सानपाडा,नवी मुंबई, महाराष्ट्र(मूलतः वाराणसी), India

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