क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के समान है-इसमें जलते आप ही हैं.

28 अगस्त 2017

बच्चों को किस तरीके से पढ़ाना चाहिए?

    “बच्चों को किस तरीके से पढ़ाना चाहिए?” यह बहुत अच्छी बात है कि हिंदी भाषा में ऐसे सवालों का जवाब खोजने की कोशिश हो रही है। अगर इस सवाल के जवाब की बात करें तो बच्चों को पढ़ाने का तरीका बच्चों के सीखने की प्रक्रिया के अनुरूप होना चाहिए।
    बच्चे देखकर, सुनकर और लोगों को देखकर सीखते हैं। बच्चों के भीतर सीखने की क्षमता असीम होती है। वे बिना स्कूल गये बोलना, लोगों से बात करना, सुनकर समझना, लोगों के व्यवहार को आब्जर्व करके सीखते हैं। अपने तरीके से ख़ुद प्रयोग करके सीखते हैं। हर पल कुछ न कुछ नया करने की कोशिशों में सीखते हैं।
‘बच्चों को बच्चा बनकर पढ़ाएं’
    अगर बच्चों को कैसे पढ़ाएं? इसका जवाब होगा कि पहली शर्त है कि बच्चे की रुचि का ध्यान रखा जाए। उसे कोई चीज़ रोचक तरीके से बतायी जाये। अगर उनको तब भी कोई बात समझ में नहीं आती है तो हर बार अलग-अलग-अलग तरीके से  समझाने की कोशिश करनी चाहिए। ऐसे उदाहरण लेने चाहिए जिसे बच्चे अपनी ज़िंदगी से जोड़ पाएं। किसी चीज़ को बार-बार और अलग तरीके से बताने का सबसे बड़ा फ़ायदा है कि बच्चा उसे अपने तरीके से सीख पाएगा। इस तरीके से सीखी हुई बात ज्यादा स्थाई होती है। बच्चों को बच्चा बनकर पढ़ाएंगे तो आपको भी मजा आएगा और बच्चों को भी सीखने में आनंद आएगा।
 एक तरीका यह भी है
    इसके लिए मैं करता हूँ, हम करते हैं, तुम करो जैसे तरीके का भी रचनात्मक तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे अंग्रेजी में I do, We Do और You Do की संज्ञा दी जाती है। यह एक तरीका है जिसमें पहले हम ख़ुद बच्चों को कोई बात बताते हैं। ख़ुद करके दिखाते हैं और उसके बाद बच्चों के साथ-साथ करते हैं। इसके बाद बच्चों को स्वतंत्र रूप से जवाब देने औऱ करने का अवसर देते हैं ताकि बच्चे की समझ पुख़्ता हो पायी है या नहीं इसका आकलन कर सकें। अगर कहीं सपोर्ट की जरूरत हो तो उसे सपोर्ट भी कर सकें।
    आख़िर में बस एक बात, “बच्चों को ख़ुशनुमा माहौल में पढ़ाना चाहिए। इस दौरान यह ध्यान रखना चाहिए कि उसे पढ़ने का आनंद मिल रहा हो। अगर बच्चों को सीखने का आनंद नहीं मिलता तो पढ़ने में अपनी रुचि खो देते हैं। बच्चों के ध्यान केंद्रित करने का समय बहुत कम होता है, इसलिए बच्चे को बहुत देर तक पढ़ाने की बजाय बीच में ब्रेक भी देते रहें।” यह सारी बातें बच्चों को घर पर पढ़ाने की दृष्टि से भी उपयोगी हैं और स्कूल में भी इनका ध्यान रखा जा सकता है।
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