‘आरक्षण’...एक कोढ़...

 
   प्रकाश झा की ‘आरक्षण’ १२ अगस्त को रिलीज हो रही है.एक बार फिर से आरक्षण का मुद्दा गरमा उठा है.इस मुद्दे पर अपनी राजनितिक रोटियां सेंकने वाले नेता मुखर होना शुरू हो चुके हैं.बैठे –बिठाये इन्हें मसाला जो मिल गया है.इन्हें डर सताने लगा है कि कहीं ये फिल्म इनके चहरे पर से नकाब न उतार दे.दरअसल जातिगत आरक्षण की बुनियाद ही गलत है.
   यदि गंभीरता पूर्वक विचार किया जाय तो आरक्षण से भारत को क्या लाभ हुआ? जो आरक्षण व्यवस्था ५० सालो मे कुछ नही कर पायी, वो आगे क्या कर पायेगी?
एक पिढी (बाप) को आरक्षण मिल जाने के बाद उसकी दूसरी पिढी(बेटे) को आरक्षण देने की क्या
जरुरत है? माना कि आपको आरक्षण चाहिये, कि आपको आगे बढने का एक मौका मिले,अब आपको पदोन्न्ती मे भी आरक्षण क्यों चाहिये?सरकारी क्षेत्रो का सत्यानाश करने के बाद अब आप निजी क्षेत्रो मे क्यो जातिगत वैमनष्यता फैलाना चाहते है?
   आजादी के बाद लक्ष्य यह होना चाहिये था कि जातिप्रथा का उन्मूलन हो, लेकिन आरक्षण ने इसे देश के लिए कभी ठीक न होने वाला कोढ़ बना दिया.आज उंची जाति के लोग दलितो से चिढते है, नफरत करते है,क्योंकि वे आरक्षण के नाम पर प्रतिभा ना होते हुये भी उनकी योग्यता को नीचा दिखा कर आगे बढ जाते है.
क्या आप आरक्षण व्यवस्था के तहत बने उस डॉक्टर  से अपना ईलाज करवाना पसंद करेंगे
जिसने १२वी मे ३५% अंक प्राप्त किये थे?और जो डाक्टर इसलिये बन गया क्योंकि वह एक जाति विशेष से था.यह ठीक है कि पिछड़ी जातियों का विकास होना चाहिए,उन्हें अपने आप को साबित करने के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए, पर यह अवसर किस तरह प्रदान किए जाने चाहिए?मुफ्त की नौकरियाँ बाँट कर और दूसरे लोगों के अधिकार छीन कर? यदि पिछड़े वर्गों का उत्थान करना ही है तो उन्हें बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए जो कि उनकी आर्थिक पहुँच के भीतर नहीं होती, ताकि वे लोग अपनी प्रतिभा को विकसित कर उसके बल बूते पर स्कूल-कालेजों में प्रवेश पा सकें और उसके बाद नौकरी हासिल कर सकें.यदि किसी को बना बनाया भोजन दे दिया जाएगा तो वो भोजन बनाना क्यों सीखना चाहेगा?
   क्या ऊँची जाति के लोगों को पिछड़ी जाति के लोगों की तरह बिना किसी मेहनत के विश्वविद्यालयों में प्रवेश मिलता है? क्या उन्हें काबिलियत न होने पर भी उच्च पदों पर नौकरी मिलती है? तो कैसे कह सकते हैं कि पिछड़ी जाति के लोगों का शोषण हो रहा है जबकि उन्हें तो पकी-पकाई खिचड़ी मिल रही है!!

   आज के समय में यदि सरकारी और निजी क्षेत्र में पिछड़ी जाति के लोगों का प्रतिशत देखेंगे तो पायेंगे कि उनकी अधिकता सरकारी नौकरियों में ही ज्यादा है.और तरक्की पर कौन सा क्षेत्र है?निजी क्षेत्र.आज जितने भी सरकारी संस्थान हैं,सब भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं,और निजी संस्थानों से पिछड़ रहे हैं.इसका क्या कारण है?धीरे-धीरे सरकारी संस्थानों का निजीकरण भी हो रहा है.उस दिन क्या होगा जब इस देश की व्यवस्था पूर्ण रूप से निजी हाथों में चली जायेगी?तब ये आरक्षित लोग कहाँ जायेंगे इस बारे में भी इस देश के करता-धर्ताओं ने कभी सोचा है?
 मुझे नहीं लगता कि मुझे कुछ कहने की आवश्यकता है
.मैं पिछड़ी जाति के लोगों पर कटाक्ष नहीं कर रहा हूँ, वरन् नाकाबिल लोगों पर कटाक्ष कर रहा हूँ और वे किसी एक जाति के नहीं होते.इस तर्क से मैं सहमत नहीं कि आरक्षण के तहत नौकरी पिछड़ी जाति के व्यक्ति को ही देनी है,चाहे वह काबिल हो या न हो, क्योंकि इसी सोच के कारण इस देश के मेघावी और कुशल डॉक्टर और इंजिनियर विदेशों में अपनी सेवा देने को मजबूर हैं और इस देश का बंटाधार हो रहा है...
   निजी क्षेत्र में भी पिछड़ी जाति के लोग ऊँचे पदों पर कार्यरत हैं, पर वे वहाँ अपनी जाति की वजह से नहीं अपितु अपनी योग्यता के बल पर विराजमान हैं और यही सही मायने में उनका विकास है.एक गंवार को जाति आदि के बूते पर नौकरी आदि देने का अर्थ है अन्य लोगों को भी उसकी राह पर चलने का उदाहरण प्रस्तुत करना.क्या यही आप चाहते हैं?भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के लिए २७ फ़ीसदी आरक्षण को वैध ठहराया है.

   उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी को आरक्षण देने के फ़ैसले से पिछड़े वर्गों को कितना फ़ायदा होगा, ख़ास कर तब जब ओबीसी सूची में शामिल होने वाली जातियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है? क्या इस मसले पर सिर्फ़ राजनीति नहीं हो रही?मूल रूप से प्रतिभा के लिए कोई आरक्षण नहीं होता है और ये किसी भी दीवार से रोकी नहीं जा सकती है. आरक्षण विकास को नीचे की ओर ढकेल रहा है. इस समय भारत को प्रतिभाओं की ज़रूरत है जो कुशल नेतृत्व कर सकें. प्रतिभा ही राष्ट्र के विकास की एकमात्र ज़रूरत है और यह बेहद दूर्भाग्यपूर्ण बात है कि भारत आरक्षण के ज़रिए प्रतिभा को क्रूरता से नष्ट कर रहा है. अंबेडकर ने इसे केवल दस साल के लिए लागू किया था,लेकिन आज के राजनेताओं ने लगता है देश को बरबाद करने की ठान ली है.जाति के आधार पर आरक्षण कभी भी न्यायसंगत नहीं हो सकता है. उन्हें छात्रवृत्ति, और मुफ़्त शिक्षा दी जानी चाहिए लेकिन उन्हें नौकरियों में आरक्षण नहीं देनी चाहिए. इस तरह के फ़ैसले लोगों की भावनाओं को आहत करते हैं. लंबे समय में इनके ख़तरनाक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं,वो कहते हैं न कि घोड़े को नदी के किनारे तो ले जाया जा सकता है लेकिन उसे पानी नहीं पिलाया जा सकता है. इसी तरह से उन्हें अच्छे संस्थानों में एडमिशन तो दिया जा सकता है,लेकिन वो सीख नहीं सकते. आप उन्हें अच्छी सरकारी नौकरी तो दे सकते हैं लेकिन वो काम नहीं कर सकते.उनका बौद्धिक स्तर आज भी उतना ही है जितना कि पहले था.आवश्यकता इस बात की भी है कि उनका बौद्धिक स्तर भी विकसित हो.

   जहां तक शिक्षा का सवाल है वहां जाति, धर्म,संप्रदाय या फिर लिंग किसी भी आधार पर आरक्षण नहीं होना चाहिए. लायक लोगों को इस देश की और यहां के नागरिकों की भलाई के लिए मौक़े मिलने चाहिए.आरक्षण से देश में प्रतिभा का नाश हो रहा है. यह सिर्फ़ गंदी राजनीति है. जाति, धर्म, संप्रदाय और क्षेत्रवाद के नाम पर हम पहले ही बंटे हुए हैं. नेता देश में ऊंच-नीच की भावना डालकर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं. जिस देश में २० करोड़ लोग ग़रीबी रेखा के नीचे हों,३५ प्रतिशत बच्चों को स्कूल न नसीब हो, इतनी ही संख्या में वे कुपोषण का शिकार हों,वहाँ आरक्षण की बात कितनी कारगर है, यह तो नेता ही बता पाएंगे.

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