क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के समान है-इसमें जलते आप ही हैं.

23 नवंबर 2010

दलित बनाम सवर्ण

   दोस्तों,नवभारत टाइम्स में एक ब्लॉग छपा है जिसका शीर्षक है ‘अब एक च****हमपर राज करेगी?’उपरोक्त च**** का अर्थ आप स्वयं लगा लीजिए .अब आप समझ गए होंगे .लेखिका का नाम है पूजा प्रसाद .ब्लॉग का विषय दलित समाज है,और ये पूजा प्रसाद भी उसी समाज का एक हिस्सा हैं.अब उन्होंने अपने लेख का शीर्षक ऐसा क्यों चुना इसे भी आप जान जायेंगे..लोग उत्सुक हों.धडाधड टिप्पणियां भेजें और वे चर्चित हो जाएँ.उनके लेख का जो भाव है वो ये है कि प्राचीन काल में सवर्णों ने दलितों का हक छीना था इसलिए आज के दलित इतने पिछड़े हैं.उनके विचार तो हास्यास्पद हैं ही,उनके लेख के शीर्षक का च**** शब्द उनकी मानसिकता का प्रदर्शन करने के लिए काफी है.लेख पढ़कर मुझसे भी न रहा गया और मैंने भी एक टिप्पणी भेज दी.टिप्पणी का कुछ हिस्सा छपा और कुछ नहीं .अब उसे ब्लॉग पर डालना उचित समझकर उसे यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.किसी की भावनाओं  को आहत करना मेरा उद्देश्य नहीं है,फिर भी कोई बात किसी को आहत कर जाय तो क्षमाप्रार्थी हूँ.
    पूजाजी,सवर्णों के पूर्वजों ने किसी दलित का हक नहीं छीना था.बिना किसी प्रमाण के आपने सवर्णों के पूर्वजों पर जो आरोप लगाए हैं,वो मात्र आपकी कुंठा को प्रदर्शित करते हैं.आप आधुनिक युग कि महिला हैं तो इस सच्चाई से मैं आपको परिचित कराना चाहता हूँ कि वर्तमान समय में दलितों का सबसे ज्यादा हक खुद दलित ही मार रहे हैं.वर्ना क्या वजह है कि इतने सालों से आरक्षण मिलने के बावजूद दलितों की दशा नहीं सुधर रही है?आप सोचेंगी कि यह कैसे?तो कृपया जान लीजिए कि शहरों में रहनेवाला तथाकथित दलित,जो आरक्षण के बल पर अपनी शिक्षा पूरी कर किसी पद पर पहुँच गया,और उसकी आर्थिक दशा सुधर भी गई,तब भी वह अपने बच्चों को हर जगह आरक्षण के बल पर ही आगे बढ़ाना जारी रखता है.वह ये क्यों नहीं सोचता कि अब मुझे अपने बच्चों को खुली स्पर्धा में छोड़ देनी चाहिए ताकि उस रिक्त जगह का लाभ किसी अन्य जरूरतमंद दलित को मिले.वैसे भी दलितों को विद्यालयों से लेकर नौकरी प्राप्त करने तक और उसके बाद भी आरक्षण के आधार पर पदोन्नति लेते रहना कहाँ तक जायज है?आरक्षण का उद्देश्य दलित समाज को खड़ा करना है और यह उद्देश्य उसे नौकरी देने पर पूरी हो जाती है.उसे अवकाश प्राप्त करने तक आरक्षण की बैसाखी क्यों थमाए रखी जाती है?
    पूजाजी,दलितों की महादूर्दशा के असली जिम्मेदार आप ही लोग हैं.शहरों के कुछ मुट्ठीभर विकसित दलित आजादी के बाद से आरक्षण का मजा ले रहे हैं और असल रूप से इसका लाभ जिन दलितों को मिलना चाहिए वे बेचारे उससे महरूम हैं.जब से आरक्षण लागू हुआ है तब से लेकर आज तक सुदूर देश के कोने में बसनेवाले दलितों की दशा आज भी जस की तस है,और इसके जिम्मेदार सवर्ण नहीं,आपके ही भाई बंधू हैं क्योंकि आप लोग स्वयं नहीं चाहते कि देश का दलित समाज आगे बढ़े अन्यथा आपके बच्चों का भविष्य खतरे में पड जाएगा.आप खुद ही बताइये,आपने दलितों का कितना उद्धार किया है?दरअसल सच्चाई यह है कि योग्य व्यक्ति को आगे बढ़ने के लिए किसी बैसाखी की आवश्यकता नहीं होती.आपका दलित समाज यदि योग्य होगा तो वह निश्चित आगे आएगा वर्ना आरक्षण की बैसाखी लेकर वह अगले सौ साल तक भी तरक्की नहीं कर पायेगा,क्योंकि उनके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा आप जैसे लोग हैं.सवर्ण यदि आगे बढ़ा है तो अपनी बुद्धि और अपनी योग्यता के बल पर.समझीं?
    पूजाजी,पहले तो आप ये समझ लीजिए कि ये वर्ण पनपा कैसे?पुरातन समय की  सामाजिक और  धार्मिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए भारतीय समाज में वर्ण की व्यवस्था की गयी थी,जिसके अनुसार कर्म और शिक्षा के आधार पर ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य तथा शूद्र वर्ण की व्यवस्था की गयी .इसमें शिक्षित और दूसरों को ज्ञान बाँटने वाले विद्वान पंडित,शिक्षक आदि  ब्राह्मण,युद्ध कला में दक्ष ,सेना के लोग,तथा समाज की रक्षा करने वाले लोग क्षत्रिय,समस्त प्रकार का व्यापार करनेवाले और सामाजिक जरूरतों को पूरा करनेवाले वैश्य तथा शारीरिक श्रम करनेवाले,चपरासी,मजदूर और अन्य निचले दर्जे का काम करनेवाले शूद्र कहलाये .तो जिसका जैसा कर्म था वह उस वर्ण का हो गया.आपका समाज शूद्र वर्ण में इसलिए चला गया क्योंकि उसके अंदर शिक्षा और संस्कार की कमी थी.उनके पास इतनी बुद्धि नहीं थी कि वे ज्ञान अर्जित कर सकें .पूजाजी ,आजकल का शिक्षित और विकसित दलित समाज जो आप देख रहीं हैं ,उनके पूर्वजों को शिक्षित करने का काम इन्हीं सवर्णों ने ही किया था .उसी का परिणाम है जो आज आप ऐसे तथ्यहीन ब्लॉग लिखकर अपने समाज की तालियाँ बटोरना चाहती हैं .यह भी एक सच्चाई है कि आजकल शहरों में तथाकथित शूद्रों का काम करनेवाले आपको सवर्ण भी मिल जायेंगे(यथा मजदूर,चपरासी,बोझा ढोनेवाले...)और अपने से उच्चपदस्थ शूद्र अधिकारी से अपमानित भी होते रहते हैं.उनके बारे में आपके क्या विचार है?वैसे भी जन्म से कोई शूद्र नहीं होता .आज का समय कर्म प्रधान है और कर्म की ही पूजा होती है .
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2 टिप्‍पणियां:

  1. जन्म से शुद्र नहीं होता तो
    ब्रह्मा के पैर से कैसे शुद्र पैदा हो गए ,
    कह दो की वेद झूठ है मनुस्मृति झूठ है ,
    हज़ारों वर्षों से जिस दलित समाज को दबाया है अब अगर वो जाग उठी है तो दर्द तो होगा ही

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  2. सवर्ण और दलित की लड़ाई जितनी पुरातन काल में रही होगी उससे ज्यादा आज है. पहले तो भेदभाव सवर्णों ने किया था आज यही दलित दलितों के साथ भेदभाव कर रहे हैं. हमारे पास प्रमाण हैं.
    इसके अलावा एक उदहारण है कि यदि इस "च" शब्द के शासक को सभी "च" धारियों कि फ़िक्र होती तो सवर्णों की जरूरत उसे भी नहीं होती.
    चलिए अब अगले कदम का इंतज़ार है. इस पर सोचना पड़ेगा.
    जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

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